Wednesday, 13 January 2016

लोहड़ी (Lohri)


सुबह सवेरे उठ कर जैसे ही बालकनी में आया गली में दूर किसी घर के आगे खड़े बच्चों की टोली को “सुंदर मुन्द्रियो हो....” गाते सुन कर लोहड़ी माँगते देखा ! ओह ! एक क्षण में ही अपना बचपन आँखों के आगे कौंध गया ! जैसे ही वो बच्चे उस घर से फारिग हुए मैंने आवाज देकर और साथ ही हाथ के इशारे से अपनी तरफ बुला लिया ! पहले तो बच्चे घबराए, सकुचाये... आजकल कौन खुद बुलाता है ? पर जब देखा कि बार बार इसरार कर रहा हूँ तो शुरुआत में पहले सहज ही कुछ शरमाते और आखिरकार फिर हिम्मत बटोर कर मेरे घर के दरवाजे तक आ ही गये !

Sunday, 3 January 2016

तू जहाँ जहाँ रहेगा.... भाग 7 समापन क़िस्त ~~ by a s pahwa



भाग 7
समापन अंक

तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 1
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 2
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 3
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 4
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 5
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 6

हजरत साबिर पाक़ का नाम सभी धर्मो के मानने वालों के दिलों में अपना एक ख़ास मुकाम रखता है | अजमेर के ख्वाजा की दरगाह के बाद, यह दूसरा ऐसा स्थान है, यहाँ सबसे ज्यादा दर्शनार्थी आते हैं | साबिर पाक, बाबा फरीद के भांजे भी थे और शागिर्द भी | वैसे तो उनके जलाल के बारे में अनेको-अनेक किस्से-कहानियाँ सुनाने वाले मिल

Saturday, 2 January 2016

तू जहाँ जहाँ रहेगा.... भाग 6 ~~ by a s pahwa


भाग 6

पूर्व प्रकाशित अंक
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 1
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 2 
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 3 
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 4 
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 5 


और फिर जैसा कि अपेक्षित था हाज़ी साहब के साथ उस पहली मुलाकात के बाद लगभग एक मास के अंतराल में राधिका और उनके बीच पांच से छह साक्षात्कार और हुए थे | यूँ तो राधिका अब पूरी तरह से ठीक थी और किशन के साथ उसका ग्रहस्थ जीवन भी भली भांति शुरू हो चुका था | परन्तु जैसा कि प्रारम्भ में ही नियत हुआ था, एक अंतिम हाजिरी साबिर साहिब की दरगाह में भरनी अत्यंतावश्यक थी, जिससे इस समस्या को इसके मूल से ही निपटाया जा सके !


Thursday, 31 December 2015

तू जहाँ जहाँ रहेगा.... भाग 5 ~~ by a s pahwa




कुछ पलों की नीरव परन्तु दमघोंटू चुप्पी के बाद अचानक ही राधिका के शरीर ने एक जुम्बिश ली और जोर-जोर से अपने हाथ-पाँव पटकने शुरू कर दिए । फिर एकाएक ही उसने अपने दोनों हाथों को फर्श के सामान्तर खोला और अपनी पूरी शक्ति से अपने हाथों को आगे-पीछे ज़ोर से लहरा कर पीछे दिवाल की तरफ पटका। इतनी शक्ति थी

Wednesday, 30 December 2015

तू जहाँ जहाँ रहेगा.... भाग 4 ~~ by a s pahwa


ससुर ने बहु के पिता को फोन कर सारी वस्तुस्थिति से अवगत करवाया, कुछ टोह भी लेने का प्रयास किया, परन्तु उन्होंने किसी भी तरह की जानकारी से साफ़ इंकार कर दिया। स्वयं उनके लिए ही यह घटना अप्रत्याशित थी। खैर, उन्हे बता दिया गया कि कल सुबह ही उनका बड़ा बेटा तथा बहू, उनकी बेटी को कुछ दिनों के लिए छोड़ने आ जायेंगे। भेजना क्यों आवश्यक है? यह बिन बताए ही राधिका के पिता समझ पा रहे थे कि उनकी बेटी के ऐसी अवस्था में होने पर उसके द्वारा या फिर उसके साथ कुछ

Tuesday, 29 December 2015

तू जहाँ जहाँ रहेगा.... भाग 3 ~~ by a s pahwa भाग 3


भाग 3
पूर्व प्रकाशित अंक

तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                               भाग 1
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                               भाग 2

ऐसा नही था कि राधिका किस व्याधि अथवा मनोग्रन्थि से पीड़ित है, अपने स्तर पर किशन ने जानने का प्रयत्न नहीं किया था। यदि पति-पत्नी समझदार हों तो दोनों एक दूसरे के ऐसे मित्र हो सकते हैं जिसके आगे दुनिया का कोई भी रिश्ता और मित्रता की कसौटी ठहर नही सकते। कमरे से बाहर उसने अपनी पत्नी से पूछने का अनथक प्रयत्न किया, परन्तु जैसे ही वह इस प्रंसग को छेड़ने का प्रयत्न करता, राधिका इस घटनाक्रम से बचना चाहती। एक घबराहट के अलावा वो कुछ कह नही पाती थी।

तू जहाँ जहाँ रहेगा.... ~~ by a s pahwa भाग 2



खेत में जहाँ, बड़े भाई प्रदीप ने छोटे भाई किशन को भेजा था, तुरन्त ही वहाँ पहुंचा। देख कर उसे झटका सा लगा कि 4 दिन पहले का नवविवाहित भाई, निराशा और परेशानी के गर्त में डूबा सा अपने खेत की एक मुंडेर पर गुमसुम सा बैठा है और यूँ ही निरुद्देश्य मिटटी के ढेले आस पास से उठा-उठा कर बेध्यानी में खेत में फेंक रहा है। दीन दुनिया से बेखबर! 


प्रदीप ने छोटे भाई किशन के कन्धे पर हाथ रखा, कई परिस्थतियो में शब्द गौण हो जाते हैं, मौन और आँखों की भाषा ही महत्वपूर्ण  हो जाती है ! विश्वास और स्नेह का एक संकेत ही जैसे बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ कह जाता है ! बस, जैसे इस एक पल का ही किशन को इंतज़ार था ! कई दिनों से किशन जो अपने भीतर ही भीतर घुट रहा था, जो वो देख और सहन कर रहा था, किसी से लाज, शर्म और संकोच से कुछ कह भी नही पा रहा था, पर अंदर ही अंदर बेहद डरा हुआ होने की वजह से भयभीत हो इस नारकीय यंत्रणा को किसी भी प्रकार से अकेला ही सहने को विवश था।