Tuesday, 7 June 2016

तेरा भाणा मीठा लागे.... शहीदी गुरु अर्जुन देव जी

तेरा कीआ मीठा लागे... शहीदी दिहाड़ा (दिन/दिवस) गुरु अर्जुन देव जी



जीवन में दो बातें शाश्वत हैं जन्म और मृत्यु! बाकी सब मिथ्या है। जन्म की ख़ुशी तो प्रत्येक समाज में धूमधाम से मनाई ही जाती है, कुछ ऐसे भाग्यशाली भी होते हैं जिनकी जन्मदिन की खुशियाँ उनकी मृत्यु के सैंकड़ों हज़ारों बरस तक भी उनके चाहने वालों द्वारा मनाई जाती हैं।
परन्तु अपवाद, दूसरे सत्य के लिए है अर्थात मृत्यु, वास्तव में जिसे हम भूल जाना चाहते हैं। मृत्यु का उत्सव बनाना तो अलग बात है, वास्तविकता तो यह है कि हम किसी की मौत को याद भी नही करना चाहते। कारण केवल इतना है कि हम सब मृत्यु से घबराते हैं। मृत्यु की कल्पना मात्र ही हमे इतना शिथिल और बेज़ार कर जाती है कि जीवन के दूसरे सबसे बड़े शाश्वत सत्य को जानते हुए भी उसकी तरफ से आँख बन्द कर लेना चाहते हैं।


हर वर्ष आप, जून माह के किसी दिन(हिंदी कैलेंडर के अनुसार ज्येष्ठ माह), गुरुद्वारों तथा बाज़ारों में ठंडे मीठे शर्बत की छबील बंटते देखते होंगे, जिसमे अधिकतर पानी, दूध तथा रूहअफजा का मिश्रण होता है। शायद कभी आपने जानने की जिज्ञासा की हो कि आज ऐसा क्या है, जो गुरुद्वारों में लंगर भी चल रहे हैं और छबील भी बंट रही है। यदि अभी तक आप इससे अनभिज्ञ हैं, तो आइये आपको सिख धर्म के सबसे पहले शहीद गुरु अर्जुन देव जी के बारे में कुछ बताने का प्रयास करता हूँ, जिनकी शहादत को श्रद्धांजलि देते हुए इस दिन लोगों को ठण्डी छबील पिलाई जाती है।


शायद सिख धर्म ही दुनिया का एक ऐसा इकलौता धर्म है जिसमे जीवन और मृत्यु दोनों को ही समभाव से देखने की दृष्टि है। जीवन का यदि स्वागत है तो मौत भी एक उत्सव है, उसका सामना करना है उससे भयभीत नहीं होना। शायद आप यह जानकर हैरान हों कि किसी भी उत्सव में भले ही वो किसी नवजात बच्चे के जन्म के उपलक्ष्य में हो, या किसी विवाह का अथवा या फिर किसी की मृत्यु का, या फिर कोई भी अन्य अवसर सभी में समान रूप से 'आनंद साहिब' के पाठ का गायन भी होगा और साथ ही कड़ाह प्रसाद की देग भी बनेगी!
इसलिए यदि गुरुओं के जन्म उत्सव पर लंगर बंटते हैं तो उनकी जीवन यात्रा की सम्पूर्णता के अवसर पर भी उसी उत्साह और श्रद्धा से यही क्रिया दोहराई जाती है।


अतः अकारण नहीं कि शायद कभी आप यह सुनकर चौंक जाए जब आप किसी सिख समाज के व्यक्ति को किसी शहीदी गुरपुरब के अवसर पर भी शुभकामनायें देते हुए पाएं। जीवन और मृत्यु को एक उत्सव की तरह मनाने की हठधर्मिता ही सिख धर्म को अन्य धर्मों से एक अलग परन्तु विलक्षण पहचान देती है।


यदि, आज  बात, हम आज के इस अवसर की करें तो 15 अप्रैल सन् 1563 में सिख धर्म के चौथे गुरु, गुरु रामदास और उनकी पत्नी बीबी भानी जी के घर, अमृतसर में, एक बालक ने जन्म लिया, जिसका नाम अर्जुन रखा गया। कालान्तर में यही बालक सिख धर्म का पाँचवा गुरु बना, जिसे गुरु अर्जुन देव के नाम से हम सब जानते हैं।


गुरु नानक देव द्वारा प्रतिपादित सिख समाज, इस समय तक एक संस्थागत रूप लेता जा रहा था। अतः बहुत आवश्यक था कि उसे एक स्पष्ट पहचान देने के लिए कुछ ऐसे स्थान भी बनाएं जाएँ, जिनका निर्माण दूर दूर तक के स्थानों पर बिखरे हुए सिखों के लिए महत्वपूर्ण हों। जिससे, बहुत तीव्र गति से विकसित हो रहा सिख समाज, इन महत्वपूर्ण स्थलों की यात्रा के माध्यम से एक दूसरे के सम्पर्क में आ सके तथा इस मेल-मिलाप की वजह से उनमें परस्पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भावना को भी बल मिल सके। इसी आवश्यकता को महसूस करते हुए उन्होंने अनेकों गुरुद्वारों का निर्माण करवाया। सिख समाज के लिए एक केंद्रीकृत स्थान की महत्ता को समझते हुए उन्होंने हरिमंदिर साहिब(जिसे आज गोल्डन टेम्पल/स्वर्ण मन्दिर भी कहा जाता है।) की स्थापना की, जिसकी नींव उस समय के मशहूर सूफ़ी साईं मियां मीर के हाथों रखवाई तथा चारो वर्णों तथा ईश्वर की उपलब्धता किसी एक ख़ास दिशा में होने के विचार को त्यागते हुए, चारो दिशाओं में इसके द्वार रखे। गुरुद्वारों के समीप ही श्रद्धालुओं के स्नानादि के लिए सरोवर की महत्ता को देखते हुए उन्होंने ही श्री हरमंदिर साहिब, अमृतसर तथा गोइंदवाल साहिब में इनका निर्माण करवाया। उनके द्वारा बनवाये गए अनेकानेक महत्वपूर्ण स्थानों में से तरनतारन भी प्रमुख्य हैं।


गुरु अर्जुन देव जी क़े समय तक गुरु नानक से लेकर गुरु अंगद, गुरु अमरदास तथा गुरु रामदास जी के द्वारा रचित बाणी या तो सिखों को मौखिक रूप से कण्ठस्थ थी, या कई परिवारों के पास उनकी हस्तलिखित प्रतिलिपियाँ  थी। वर्ण व्यवस्था के चलते आम जनमानस में शिक्षा का घोर अभाव था, अतः लोग लिखे हुए को स्वयम् पढ़ पाने में पूर्णतया असमर्थ थे। इस स्थिति का लाभ लेते हुए, कुछ अन्य महंत तथा डेरों के स्वामी अपने स्वरचित पदों को रच कर उन्हें गुरु नानक तथा अन्य सिख गुरुओं की बानी कह कर आम जन मानस को भर्मित करने का प्रयास करने लगे थे।


इस आशय की शिकायतें जब गुरु साहिब के पास पहुँची तो उन्होंने गुरुबाणी के एक प्रमाणिक संकलन की  आवश्यकता को महत्वपूर्ण समझते हुए गुरु नानक देव जी के समकालीन रहे बाबा बुड्डा जी और भाई गुरदास जी को यह जिम्मेवारी सौंपी कि वह देश विदेश घूम कर सभी पूर्ववर्ती सिख गुरुओं के साथ साथ सन्त कबीर, बाबा फरीद, सन्त रैदास, भाई धन्ना, भाई पीपा तथा अन्य भक्तों की प्रमाणिक बाणी को एकत्रित करके लाएं, जिसे संकलित कर, एक ग्रन्थ के रूप में उनका सम्पादन किया जा सके।


गुरु अर्जुन के प्रारब्ध में बाणी के सार सम्भाल का जिम्मा है, इसकी कल्पना उनके नाना तथा तीसरे गुरु अमरदास जी ने उनके बाल्यकाल में ही कर ली थी, इस सन्दर्भ में उनका एक बचन बहुत प्रचलित है -


               दोहिता बाणी का बोहिथा।


एक बार सभी बाणी के एकत्रित हो जाने के पश्चात, उसके सम्पादन का कार्य अमृतसर में शुरू किया गया। सिख गुरुओं के साथ साथ उसमे हिन्दू और मुस्लिम सन्तों की बाणी को भी समुचित सम्मान और स्थान दिया गया जिनमे  कबीर, जयदेव, रविदास, नामदेव, धन्ना, पीपा, रामानंद, फरीद, मरदाना, सत्त्ता और बलवन्द आदि प्रमुख़ हैं। और, फिर अंततः एक वर्ष की कठिन मेहनत के बाद जो पहला ग्रन्थ तैयार हुआ उसे ' आदि ग्रन्थ' अर्थात 'पोथी साहब'  का नाम देकर, उसकी स्थापना दरबार साहिब में की गई, गुरूजी ने इसे अपने से ऊपर स्थान दिया और साथ ही भाई बुड्डा जी  को पहला ग्रंथी बनाया गया।


सम्पादन के अलावा, गुरु अर्जुन देव जी ने भी स्वयम् भी काफी बाणी की रचना की। गुरु ग्रन्थ साहिब में वर्णित लगभग 2000 शब्दों के अतिरिक्त 'सुखमनी साहिब' उनकी ऐसी रचना है, जो सबसे अधिक महत्व रखती है, 24 अष्टपदीयों, जिनमे प्रत्येक अष्टपदी में 8 शब्द है तथा प्रत्येक अष्टपदी की शुरुआत एक श्लोक से होती है। अतः श्लोकों में रचित यह बाणी राग गउड़ी पर आधारित है। अपने अतुलनीय महत्व के कारण इसका पाठ तथा गायन सिख समाज में सबसे अधिक किया जाता है।


पँजाब (अविभाजित भारत के समय में जब लाहौर भी इसी का एक भाग था) में चल रही इन सब धार्मिक गतिविधियों के समानांतर ठीक इसी समय राजनीतिक गतिविधियां भी पूरे उफान पर थीं। लाहौर और दिल्ली के तख़्त पर बादशाह जहाँगीर का शासन था, गाहे बेगाहे उसे दक्षिण की तरफ उठ रहे विद्रोहों को कुचलने के लिए जाते रहना पड़ता था, जिस कारण से रोजाना के राजकाज के लिए दिल्ली दरबार में दरबारियों और मंत्रियोंं का हस्तक्षेप बड़ गया था। बादशाह अकबर की मृत्यु के बाद यूँ भी दिल्ली दरबार में मुल्ला मौलवियों की धमक बड़ रही थी। अकबर, यहाँ सिख धर्म और गुरुओं के प्रति बहुत सम्मान का भाव रखता था, वहीँ उसकी मृत्यु के पश्चात, सिख धर्म के बढ़ते प्रभाव के कारण कुछ लोगों के माथे पर त्योरियाँ पड़नी शुरू हो चुकी थी, क्यूँकि अपने वर्तमान धर्म से असन्तुष्ट तथा तिरिस्कृत लोग, जो कि आबादी के बहुत बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करते थे, अब इस धर्म के लचीले रवैये के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करने लगे थे।


कुछ ऐसी परिस्थितियाँ घटित हुई कि दिल्ली दरबार में गहरी पैठ रखने वाले एक धनी व्यापारी चन्दू मल की बेटी का रिश्ता कुछ अपरिहार्य कारणों की वजह से गुरु जी के पुत्र के साथ न हो सका, जिससे उसने अपने आप को बहुत अपमानित महसूस किया और तैश में आकर अपने विश्वस्त दरबारियों की मार्फ़त जहाँगीर के कान भरने शुरू करवा दिए, जिनका सार यह था कि सिख धर्म के ग्रन्थ में ऐसी बाणियों का संकलन है, जो मूलतः इस्लाम विरोधी हैं। जहाँगीर, जो पहले से ही इस बात से ख़फ़ा था कि उसका अपना पुत्र खुसरो, जिसने उससे बगावत करके गुरु की शरण में पनाह पाई थी, अपने दरबारियों एवम् मुल्लाओं की सलाह अनुसार जहाँगीर ने गुरु साहिब को पैगाम दिया कि वो अपने ग्रन्थ के साथ लाहौर आएं तथा इस शँका का समाधान करें।


गुरु जी जानते थे कि इस समस्या का मूल कारण क्या है, तथा इसका परिणाम क्या हो सकता है, अतः दिल्ली जाने से पूर्व उन्होंने सिख संगत को अपने आदेश में भविष्य में आने वाले संकटो के लिए तैयार रहने के दिशा निर्देश देने के साथ साथ अगले गुरु के लिए हरगोबिन्द साहब को नियुक्त कर अपने कुछ सहयोगियों के साथ लाहौर की तरफ कूच किया।


लाहौर में उनकी मुलाकात जहाँगीर से हुई, मुल्ला- मौलवियों तथा इस्लाम के अन्य जानकारों के साथ साथ दरबारियों के साथ भी इस ग्रन्थ में वर्णित बाणी पर गहन चर्चा हुई। कुल मिलाकर, अंत में जहाँगीर की तरफ से यह आदेश हुआ कि गुरबाणी के उन पदों को( जो शाब्दिक अर्थों में इस्लाम और हिन्दू धर्म के विरुद्ध लगते हैं) हटा दिया जाए अथवा उनका सम्पादन कर दिया जाए। परन्तु, गुरु अर्जुन ने गुरु नानक की बाणी में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ करने से स्पष्ट इंकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप राजाज्ञा की अवहेलना के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।


इस बीच, जहाँगीर को कश्मीर की तरफ जाना था अतः अपने विश्वसनीय दरबारी मुर्तज़ा खान(दुर्भाग्यवश जो पहले से ही चन्दू के प्रभाव में था ) के सुपर्द इस मामले को सौंप वह चला गया। इस दरबारी के ऊपर चन्दू के धन बल का प्रभाव अधिक था, अतः उसने अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को अपने अहम से जोड़ते हुए गुरु साहिब को अनेक प्रकार की कड़ी सजाएं दिलवानी शुरू कर दी। गर्म पानी में बैठाने से लेकर लोहे के गर्म तवे पर बैठाना, साथ ही शरीर पर गर्म रेत डलवाना... भले ही गर्मी के इस प्रभाव से उनके शरीर पर फफोले पड़ गए परन्तु अपनी अडोल शक्ति एवम् गुरबाणी के सिमरन से वो ऐसे दुष्कर तसीहे भी संयत भाव से सहते गए। अकाल पुरुख से बस यही एक याचना


"दया करो नानक गुन गावे, मिट्ठा लगे तेरा भाणा"


जितना संयम वो रखते गए, तसीहों की क्रूरता भी उतनी ही बढ़ती गई, परन्तु उन्हें अपनी मनमर्जी के मुताबिक झुकाया न जा सका। पाँच दिन, इसी प्रकार से क्रूरतम सजाओं का दौर चलता रहा, परन्तु आदि ग्रन्थ में बदलाव की किसी भी माँग को पूरा न करवाया जा सका।


अब आगे ऐसा क्या करें कि गुरु झुक जाएँ, इसकी कोई राह मुर्तज़ा खान और दिवान चन्दू को सूझ न रही थी। पाँचवे दिन के बाद, गुरूजी ने रावी नदी में स्नान की इच्छा जाहिर की। उनके विरोधी जो अभी तक के अपने प्रयत्नों में निष्फल हो चुके थे, इसे भी सज़ा का एक चरण मान राज़ी हो गए। फफोलों से भर चुका शरीर, रावी नदी का शीतल जल और चारो तरफ अश्रुपूरित हज़ारों आँखे उन श्रद्धालुओं की, जो उनकी खोज-खबर लेने वहाँ तक पहुँच गए थे। 30 मई 1606 का दिन, बेपरवाह और अडोल गुरु ने रावी के किनारे, सिमरन किया, इकठ्ठा हुए जन समुदाय को ढाँढस बंधाया और फिर निरंकार का शुक्रिया अदा करते हुए रावी नदी के शीतल जल में जल समाधि ले ली।


जुल्म और ज़ालिम से टकराने का इस नए नवेले धर्म का यह प्रथम अनुभव था, जिसकी परीक्षा में यह खरा उतरा था। अपने प्राण न्योछावर करने की हद तक जाकर, अपने विरोधी की इच्छा के आगे न झुकना, यही विरोधी की सबसे बड़ी शिकस्त होती है। और ऐसा ही हुआ था उस दिन, गुरु अर्जुन देव की शहादत के रूप में सिख धर्म ने अपने प्रथम शहीद को कमाया था, जिसकी लासानी कुर्बानी ने आगे जाकर सिख धर्म को एक नया मोड़ दिया। जो धर्म अभी तक केवल धार्मिक ही था, उसे अब संगठित रूप लेकर राजनीतिक और रणनीतिक क्षेत्र में भी प्रभुत्व जमाने की इच्छा जागृत हुई। गुरबाणी के साथ साथ शस्त्र का प्रयोग करना, यानि एक सन्त-सिपाही का किरदार अदा करना, यह इस कुर्बानी का सबसे बड़ा प्रतिफल था।


इसका परिणाम यह हुआ कि जिस दिल्ली दरबार में गुरु अर्जुन देव जी को शहीदी दी थी, एक दिन उसी मुगलिया हकूमत को परास्त करते हुए सिखों ने दिल्ली के ऊपर अपना कब्ज़ा जमा लिया था। अपनी हकूमत कायम नहीं रख पाए, इसकी विवेचना फिर कभी किसी और अवसर पर!



आज बस, सिख धर्म के इस पहले शहीद शिरोमणि को अपनी श्रद्धा के फूल अर्पित करते हुए केवल इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि गुरु अर्जुन एक बेहतरीन दार्शनिक, रहस्यवादी कवि, बेहद प्रगतिशाली समाज सुधारक और संगठन कर्त्ता होने के साथ साथ कुशल नीति निर्माता और विश्वास तथा आस्था के लिए अपने आप को कुरबान कर देने वाले अपनी तरह के प्रथम शहीद थे।


आज भी जब ज्येष्ठ माह के इन दिनों में गर्मी का कहर अपने पूरे ज़लाल पर होता है, गुरुद्वारों तथा अन्य उन सभी स्थानों पर जहाँ नानक नाम लेवा संगत होती है, गर्मी से त्रस्त सभी राह चलते मुसाफिरों को ठन्डे शर्बत की छबील पिला कर गुरु जी के इस सर्वोच्च बलिदान को याद रखा जाता है। गर्मी से त्रस्त मानवों को इन दिनों में ठण्डा-मीठा पानी पिलाकर गुरूजी को अपनी श्रद्धांजलि देने का इससे बेहतरीन कोई और तरीका सम्भव भी नहीं है।
🙏🙏🙏
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