Wednesday, 13 April 2016

हौं आया दूरों चल के.... वैसाखी का इतिहास, पांवटा साहिब की यात्रा

हौं आया दूरों चल के.... वैसाखी का इतिहास, पांवटा साहिब की यात्रा 


सन् 1685 का समय
एक 20 वर्षीय नौजवान अपने घोड़े पर सवार हिमाचल की वादियों में अपने कुछ विश्वसनीय सहयोगियों के साथ घूम रहा है। हर तरफ प्रकृति के सुंदर नजारे हैं, घना जंगल है, मीलों दूर तक कहीं कोई आबादी नही। सिरमौर से चला साथिओं का यह समूह  घूमते घूमते उसकी सीमाओं तक निकल आया, जिधर यमुना नदी बह रही है।
पथरीले रास्तों से अपनी राह बनता यह दल अभी आगे बढ़ ही रहा है कि अचानक एक जगह घोड़े का पाँव मार्ग में पड़े किसी पत्थर से टकराकर लड़खड़ाया ! घोड़े का सन्तुलन बिगड़ा, जिससे बचने के लिए नौजवान को अपने पाँव तुरन्त ही धरती पर टिकाने पड़े।
घोडा घायल है अब उस पर आगे सवारी मुमकिन नही, अतः यही उचित जान पड़ा की फिलहाल यहीं पर विश्राम किया जाए! यमुना के किनारे, एक सुरक्षित और समतल स्थान पर तम्बू लगा दिए गये। सिरमौर के राजा को सन्देश भेज दिया गया कि अभी कुछ दिन इधर ही विश्राम किया जाएगा। आसपास के लोगों से लेकर सदूर पंजाब तक में बसे लोगों को जैसे ही उस नौजवान के उस क्षेत्र में रुकने की भनक लगी वो तुरन्त ही अपनी अपनी सामर्थ्यानुसार भेंट लेकर उस नौजवान के दर्शन हेतु उस स्थान की तरफ निकल पड़े । और फिर देखते ही देखते उस जंगल में मंगल हो उठा !

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1670 का समय था, जब औरंगजेब के नेतृत्त्व में मुगल सल्तनत अपने सम्पूर्ण आवेग के साथ अपनी तलवार के पराक्रम के बल पर हिन्दुस्तान की सभी रियासतों को अपने अधिकार में करने के प्रयास में जी तोड़ जुटी हुई थी। राजशाही में सल्तनत को स्थाई बनाये रखने के लिए उपयोगी है कि राजा तथा प्रजा दोनों का धर्म एक हो! अत: मुगल सम्राज्य के विस्तार के साथ साथ हिन्दुस्तान की आबादी को भी इस्लाम में लाने के लिए प्रयत्न पूरे उफान पर थे! यह प्रयास रंग भी ला रहे थे और आबादी का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम धर्म को स्वीकार कर चुका था!

इसी कड़ी में मुग़ल सल्तनत का आदेश कश्मीर के ब्राह्मणों की तरफ भी गया कि बाकी देश के लोगों की तरह वो भी इस्लाम की शरण में आ जायें अन्यथा उन पर एक भारी कर (जजिया) लगाया जाएगा! परेशान कश्मीरी ब्राह्मण अपने जानो-माल और धर्म की रक्षा हेतु सभी तरफ आस की नजर से देखने लगे! परन्तु सम्पूर्ण भारत वर्ष के किसी शूरवीर में इतना साहस न था कि मुगल सल्तनत से विरोध करने की हिम्मत जुटा पाता! आखिर कश्मीरी ब्राह्मणों का यह समूह आन्दपुर साहिब में गुरु तेगबहादुर साहिब की शरण में गया ! आगे के इतिहास से आप सभी वाकिफ ही हैं किस प्रकार से सिख धर्म के नवें गुरु, ‘हिन्द की चादर, तेग बहादुर ‘ ने दुनिया के इतिहास में प्रथम बार, किसी अन्य धर्म की रक्षा के लिए अपनी लासानी कुर्बानी देकर कश्मीरी ब्राह्मणों की रक्षा की!

10 बरस की अल्प आयु में बालक गोबिंद राय को सिख पन्थ का दसवां गुरु बना दिया गया ! परन्तु किशोर अवस्था में आते आते उन्होंने अपना मत बना लिया था कि सिख समाज का वक्ती तौर पर जो अभी स्वरूप है भक्ति वाला, देश काल की परिस्थतियो के अनुसार उसमे परिवर्तन जरुरी है! परन्तु यह परिवर्तन क्या हो, इसकी रूप रेखा पर मनन करने के लिए वह अपने कुछ साथिओं के साथ, अपने मित्र और हिमाचल में सिरमौर के राजा मेदनी प्रकाश के आमन्त्रण पर उसकी रियासत में कुछ समय बिताने के लिए चल पड़े!



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राजा मेदनी प्रकाश के आग्रह पर वो सिरमौर में किसी स्थान को अपने आगामी कुछ दिनों के ठहरने हेतु ढूँढने के उद्देश्य हेतु घूम ही रहे थे कि उन्हें अचानक ही, घोड़े के घायल हो जाने के कारण इस स्थल पर ठहरना पड़ा !

यमुना के शांत किनारे पर जिस जगह पर, गुरु गोबिंद राय का ठहरना हुआ था उस जगह को उनके घोड़े के पाँव के अटकने की वजह से नाम दिया गया पाँवटा अर्थात पाँव अटका...जो फिर धीरे धीरे पौंटा भी हुआ! राजा मेदनी प्रकाश को यह सूचना प्राप्त होते ही उसने गुरु जी के रहने हेतु उचित व्यवस्था करवाने के लिए तुरंत ही एक ईमारत बनवाने का आदेश दिया ! और इधर गुरु गोबिंद राय यमुना के किनारे एकांत अवस्था में मनन करने में अपना समय लगाने लगे कि किस प्रकार से सिक्ख कौम का विकास किया जा सके जो भक्ति में गुरु नानक की चलाई हुई रीत को लेकर चले परन्तु जब दुश्मन से सामना होने वाली प्रतिकूल दशा में सिपाही का रूप लेकर पूरी शक्ति के साथ उसका प्रतिरोध भी करे !

एक चाह और भी थी कि गुरु तेग बादुर जी की शाहदत के समय मुगल सरकार की तरफ से यह खुली चुनौती दी गई थी कि यदि है कोई गुरु का सिख जो इनके शरीर को यहाँ से ले जाने का साहस कर सके ! परन्तु डर की वजह से कोई हिम्मत न कर सका ! अत: आवश्यक था कि एक ऐसे पन्थ का निर्माण जो अपनी पहचान न छिपा सके! लाखों की भीड़ में भी वो अकेला ही स्वयम अपने गुरु का प्रतिरूप हो ! जिससे उसके धर्म के बारे में पूछना न पड़े ! जिसका पहनावा और शारीरिक बाना ही पर्याप्त हो उसे गुरु का सिख बताने के लिए !

इतनी चुनौतिया, और केवल बीस बरस की आयु ! परन्तु जब नियति आपको किसी कार्य की सिद्धि हेतु चुनती है तो उन आवश्यक गुणों का भी आपके भीतर समावेश करती है जो आपके कार्य की सफलता के लिए आवश्यक हैं!

एक शूरवीर यौद्धा होने के अलावा, गुरु गोबिंद राय एक बेहतरीन कवि और अच्छे काव्य के प्रशंसक भी थे ! उनके यहाँ ठहरने की खबर फैलते ही दूर दूर से कवि और भाट भी उनके पास आने लगे! जिनमे से बनारस से आये कविओं को उन्होंने हिंदु ग्रंथों के अनुवाद का कार्य सौंपा ! कुल 52 कवि उनके दरबार में हो गये थे जो उनकी छत्रछाया में अपना काव्यसृजन कर रहे थे! अपने इस एकांत वास में उन्होंने स्वयम भी बहुत से काव्य ग्रंथों की रचना की जो सिख पन्थ के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं ! जिनमें, जाप साहिब, सैवैये, चंडी दी वार, तथा दशम ग्रन्थ का शुरूआती भाग प्रमुख्य हैं ! काव्य के आलावा पांवटा को एक सुंदर और व्यवस्थ्ति नगर बनाने के लिए भी उन्होंने कई प्रयास किये! गुरु जी के बड़े सुपुत्र साहिबजादा अजीत सिंह का जन्म भी इसी जगह पर हुआ !

लगभग चार बरस के अपने इस पांवटा प्रवास के दौरान अपनी भविष्य की कार्य योजना का पूरा खाका उन्होंने खींच लिया था! उनके इस क्षेत्र में रहने के दौरान उन्हें राजा मेदनी प्रकाश के विरोधी राजाओं से कई छोटे युद्ध भी लड़ने पड़े जो इस बात से आशंकित थे कि सिरमौर का राजा सिखों के गुरु के साथ मिलकर शायद उनके राज्य पर हमला करने की तैयारी कर रहा है! इन युद्धों के द्वारा गुरु गोबिंद राय ने सिख समाज को एक सिपाही के तौर पर तैयार करने और उन्हें नियमित युद्ध अभ्यास की जरूरत के बतौर एक कला का आविष्कार किया जिसे “गतका” कहा गया जो आज भी किसी भी सिख पन्थ द्वारा निकली गयी शोभा यात्राओं का एक अभिन्न अंग है और जिसका प्रदर्शन सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र होता है!

“बाणी, बाणा और युद्ध के लिए हरदम तैयार सिंह सूरमा” यह गुरु गोबिंद राय की चार बरस की पौंटा साहिब की कमाई थी जो आधार बनी 1699 में आज ही के दिन, आन्नदपुर साहिब में उस ऐतिहासिक अवसर की जब गुरु गोबिंद राय ने अमृत चखा कर पंच प्यारे चुने, और फिर उन पंच प्यारों से स्वयम भी अमृत की दात लेकर, ‘आपे गुर चेला ‘ की एक विलक्षण परम्परा को कायम करते हुए सिख कौम को भक्ति मार्ग के साथ साथ सिपाही के रास्ते भी चला कर खालसा पन्थ का निर्माण किया ! इसके साथ ही यह भी आवश्यक हो गया कि हर सिंख अपने नाम के साथ ‘सिंह’ की उपाधि लगाएगा और हर सिखनी ‘कौर’ की ! अत: गुरु गोबिंद राय ने भी अपने नाम के साथ सिंह लगाकर गुरु गोबिंद सिंह का नाम धारण किया ! साथ ही अमृत छके हुए हर तैयार-बर-तैयार सिख को पांच ककार (केश, कंघा, कड़ा, कच्छ और कृपाण) धारण करने का हुक्म भी दिया गया!
इसी के साथ दुनिया के इतिहास में एक ऐसी ‘संत-सिपाही’ कौम विकसित हो गई जो गुरु नानक द्वारा निर्देशित, ‘कर्म करो, वंड छक्को, नाम सिमरो’ के साथ साथ युद्ध क्षेत्र में सवा लाख से एक लडाऊं की इच्छाशक्ति भी अपने भीतर रख सकती थी! जिसका प्रमाण इस कौम ने अपने जन्म से लेकर आजतक हर मैदान में दिया है!   

सिक्खी के इतिहास को जानने तथा आनंदपुर साहिब की 1699 की उस बैशाखी के महत्व की पृष्ठभूमि को जानने समझने के लिए पौंटा साहिब की यात्रा आवश्यक है ! यदि आनंदपुर साहिब में गुरु गोबिंद सिंह जी का कर्म है तो पौंटा साहिब में दर्शन! कर्म को समझने के लिए दर्शन की समझ अत्यंत आवश्यक है!

दिल्ली से करीब 240 किमी की दूरी पर स्थित है देहरादून, जो वर्तमान में उत्तराखंड की राजधानी भी है ! यहाँ तक आप बस, ट्रेन अथवा हवाई जहाज के आलावा सड़क मार्ग से अपनी कार द्वारा भी बहुत आसानी से पहुँच सकते हैं ! फिर यहाँ से केवल 52 किमी दूर चकराता की तरफ स्थित है पौंटा साहिब जो हिमाचल में पड़ता है ! इसके अलावा यदि किसी अन्य दिशा से आना हो तो, चंडीगढ़ से इसकी दूरी 150 किमी, सहारनपुर से70 किमी. तथा हरिद्वार से 110 किमी है ! चारों दिशाओं से यह स्थल सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है !



गुरुद्वारा साहिब की इमारत विशाल है तथा सभी सुविधाओं से परिपूर्ण भी ! पूरा समय रागी सिंह एवं कथा वाचक गुरु महिमा का वर्णन करते हैं! गुरुद्वारा साहब की मुख्य ईमारत के समीप ही इसी प्रांगण में कुछ छोटे स्मारक हैं जिनमे वह स्थान प्रमुख हैं जहाँ कवि अपना रचना कार्य करते थे, तथा अपनी रचनाएँ सुनाते थे! इसके अलावा, जिस जगह पर गुरु जी दस्तारबंदी की प्रतियोगिता करवाते थे तथा अन्य युद्ध कलाओं का प्रदर्शन किया जाता था, वह स्थल भी दर्शनीय हैं ! 







मुख्य हाल के अंदर ही गुरूजी के द्वारा इस्तेमाल किये गए कुछ हथियार भी रखे गए हैं, जिनकी जानकारी उस देशकाल में युद्ध सामग्री के उपकरणों के तौर पर उपयोगी भी हैं और ज्ञान वर्धक भी !
पौंटा साहिब के मुख्य गुरुद्वारे के अतिरिक्त आसपास के क्षेत्रों में भी गुरु गोबिंद सिंह जी से सम्बन्धित अन्य एतिहासक स्थान भी हैं, जिनमे भंगाणी साहिब (जिस स्थान पर गुरुगोबिंद सिंह जी व अन्य पहाड़ी राजाओं के मध्य युद्ध हुआ), गुरुद्वारा शेरगढ़ साहिब,(जिस जगह गुरूजी ने शेर का शिकार किया), आसन्न लेक,(हिमाचल प्रदेश के पर्यटन विभाग दवारा निर्मित यह झील भी सैलानिओं के आकर्षण का केंद्र है ! इसके अतिरिक्त कल्प ऋषि का स्थल और किला लौहगढ़ भी आने वाले का ध्यान अपनी तरफ खींचते हैं ! यहाँ से लगभग 25 किमी दूर स्थित डाक पत्थर (उत्तराखंड) में, एक पिकनिक सपाट के तौर पर पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं जहाँ बिजली निर्माण भी होता है !
  
हमने इस स्थान की यात्रा रेणुका जी झील से लौटते हुए, नाहन की तरफ से की थी! 42 किमी की यह एक अलग प्रकार की रोमांचक यात्रा थी, जिसका अधिकाँश भाग कच्ची पहाड़ी सड़क से होकर तीक्ष्ण पहाड़ी मोड़ों से होते हुए गुजरा था, तथा एक उफनती हुई पहाड़ी नदी भी पार करनी पड़ी थी! उस यात्रा के कुछ बेहतरीन पल हैं हमारे जेहन में, जिनकी याद हमे आज भी रोमांचित कर जाती है !


विशाल गुरुद्वारा साहिब की ईमारत के बगल में ही यात्रिओं के निवास हेतु काफी कमरे हैं जो निशुल्क उपलब्ध हैं! लंगर की व्यवस्था तथा समयानुसार चाय व जलपान की सुविधा सभी अन्य एतिहासिक गुरुद्वारों की ही तरह निशुल्क उपलब्ध है !  






वर्तमान में पौंटा साहिब एक छोटा मगर विकसित शहर है, गुरुद्वारा साहिब के इतर भी AC/Non AC होटल, हर प्रकार का खाना-पीना गुरूद्वारे के करीब बाज़ार में उपलब्ध है !  
यहाँ जाने के लिए साल का कोई भी महीना उपयुक्त है | समुद्र स्थल से लगभग 1276 फीट की उंचाई तथा यमुना के किनारे इसके स्थित होने के कारण आमतौर पर मौसम खुशगवार ही रहता है ! यहाँ सर्दिओं में तापक्रम जीरो डिग्री के करीब तक पहुँच जाता है तो गर्मिओं में 40 डिग्री तक भी!
होली के दिनों में यहाँ होला-मोहल्ला उत्सव मनाया जाता है जिस वजह से दूर दूर से लोग इस स्थल पर आते हैं! इसी प्रकार, जून से हेमकुण्ड साहब की यात्रा शुरू होने पर भी. यह यात्रिओं के लिए तथा बाइकर्स के लिए रुकने का मुख्य स्थल है! अत: उन दिनों में यहाँ संगत का दबाव ज्यादा रहता है जिस वजह से स्थान मिलने में मुश्किल हो सकती है ! अत: अपनी यात्रा योजना बनाते हुए इन बिन्दुओं को भी ध्यान में रखें !  

धन्यवाद!  
    















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