Tuesday, 29 December 2015

तू जहाँ जहाँ रहेगा.... ~~ by a s pahwa भाग 2



खेत में जहाँ, बड़े भाई प्रदीप ने छोटे भाई किशन को भेजा था, तुरन्त ही वहाँ पहुंचा। देख कर उसे झटका सा लगा कि 4 दिन पहले का नवविवाहित भाई, निराशा और परेशानी के गर्त में डूबा सा अपने खेत की एक मुंडेर पर गुमसुम सा बैठा है और यूँ ही निरुद्देश्य मिटटी के ढेले आस पास से उठा-उठा कर बेध्यानी में खेत में फेंक रहा है। दीन दुनिया से बेखबर! 


प्रदीप ने छोटे भाई किशन के कन्धे पर हाथ रखा, कई परिस्थतियो में शब्द गौण हो जाते हैं, मौन और आँखों की भाषा ही महत्वपूर्ण  हो जाती है ! विश्वास और स्नेह का एक संकेत ही जैसे बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ कह जाता है ! बस, जैसे इस एक पल का ही किशन को इंतज़ार था ! कई दिनों से किशन जो अपने भीतर ही भीतर घुट रहा था, जो वो देख और सहन कर रहा था, किसी से लाज, शर्म और संकोच से कुछ कह भी नही पा रहा था, पर अंदर ही अंदर बेहद डरा हुआ होने की वजह से भयभीत हो इस नारकीय यंत्रणा को किसी भी प्रकार से अकेला ही सहने को विवश था। 

पर आज बिना कुछ कहे ही भाई का सांत्वना और वात्सल्य से भरा हाथ कन्धे पर पड़ते ही उसके सब्र का बाँध टूट गया। एक अबोध बालक की तरह, बड़े भाई का सहारा मिलते ही जैसे सदियों से सुप्त पड़ा कोई ज्वालामुखी अचानक से ही लावा उगलना शुरू कर देता है, बस वही स्थिति बन आई। जाने कितनी ही देर बड़े भाई के कन्धे पर सर रख रोता रहा, और फिर जब उसका मन कुछ हल्का हुआ और फिर किशन ने जो कुछ प्रदीप को बताया, उसे सुन उसके तो पाँवों तले जमीन ही खिसक गई।

उसकी शादी जिस लड़की से हुयी थी, वो सर्वगुण सम्पन्न थी, उसमे कोई दो राय ही नही थी। उसे पसन्द भी बहुत थी। रंग-रूप, पढ़ाई-लिखाई, ससुराल, संस्कार इन सभी में कहीं कोई कमी नहीं थी, और न ही उसे इस बाबत किसी भी प्रकार की कोई शिकायत थी।
पर जो चीज हैरानी की थी, वो था उसका दोहरा व्यक्तित्व!
बैडरूम में जाते ही उसे महसूस होता था कि उन दोनों के मध्य कोई और भी है, कोई एक तीसरा....
और यह तीसरा कोई पुरुष नही औरत थी।
बाहर नही, उसकी पत्नी के ही भीतर...
जैसे एक शरीर परन्तु दो आत्माएँ...
इसलिए 4 दिनों के पश्चात भी अभी तक उनका वैवाहिक जीवन शुरू नही हो सका था।
क्यूँकि जैसे ही वह अपनी पत्नी के समीप जाने का प्रयास करता, उसके चेहरे के रंग बड़ी तेजी से बदलते। एक अज़ब सी कशमकश उसके भीतर शुरू हो जाती, किशन के लिए एक अकल्पनीय सा अंतर्द्वन्द्व... जैसे शरीर का एक हिस्सा उसके करीब आना चाहता है और दूसरा उतनी ही शक्ति से उसे पीछे धकेल रहा है! आवाज में परिवर्तन आ जाता। हाथ-पैर, बुरी तरह से अकड़ने लगते। पूरा शरीर बुरी तरह से किसी अज्ञात जकड़न से उलझने लगता। यूँ लगता जैसे उसकी पत्नी और उसके अंदर के मौजूद किसी और अंश से उसका कोई युद्ध चल रहा है। पहले दिन तो उसने समझा कि यह शादी और नई जगह के माहौल की घबराहट है, अतः उसने इसे साधारण बात समझ टाल दिया, कुछ उसके समझदार मित्रों और निकट के परिजनों ने भी उसे समझाया था कि हमारे सामाजिक परिवेश के चलते सभी कुछ एकदम से सहज नही हो पाता। अतः वह कुछ तो ऐसी स्थिति के लिए मानसिक रूप से भी तैयार था, पर यह केवल डर और घबराहट मात्र तो नही था, यह तो एक प्रकार का खण्डित व्यक्तित्व सा था। खैर, किसी प्रकार से यह उलझन भरी रात कटी।
सुबह जान पहचान वालों और मित्रों के कटाक्षों और चुहलबाज़ीओं से बचते हुए उसने उन सब से यथा सम्भव दूरी बना कर रखनी ही उचित समझी। मिलने जुलने वाले और पास पड़ोस की औरतों के लिए नव नवेली बहू की मुँह दिखाई में वैसे भी उसका कोई कार्य नहीं था। परन्तु इतना उसके लिए भी आश्चर्यजनक और राहत भरा अवश्य था कि राधिका पूर्णतयः सामान्य व्यवहार कर रही थी। जैसा कि उससे अपेक्षित था, वो सभी शिष्टाचार, बिलकुल सामान्य ढंग से... अतः किशन ने भी कल रात की घटना को एक बुरा दुःस्वप्न मान अपने मन से झटकने का यथोचित प्रयास किया।

परन्तु रात को एकांत में वही कल वाली समस्या!
किशन का भाग्य उसके साथ कैसी आँख-मिचौली खेल रहा है, वह तो इस सबसे सर्वथा अनजान था।

पूर्व निर्धारत योजनानुसार, उनकी घूमने जाने की टिकटें और आगे होटलों की बुकिंग... सब कुछ पहले से ही बुक था। परन्तु किशन तो अब जाना ही नही चाहता था, यहाँ कम से कम परिवार का तो सहारा था, वहाँ दूर किसी स्थल पर ऐसी परिस्थिति में क्या करेगा? पर किसी से भी कहे क्या? क्या बताये किसी को? वो तो अभी खुद ही कुछ नही जानता!

दुनियादारी और खुद को जगहंसाई का पात्र बनने से बचा कर रखने हेतु, दिल पर पत्थर रख किसी तरह से होंठों पर एक नकली हँसी का आवरण ओढ़े उसने खुद को इस घटनाक्रम के हवाले कर दिया, और घरवालों से विदा ले हनीमून के लिए रवाना हो गया।

परन्तु वहाँ यह समस्या कुछ और भी विकट हो कर सामने आई, अभी तक परिवार के रहते जो परिस्थिति केवल रात को उसके शयन कक्ष में जाने पर ही आती थी, यहाँ होटल के कमरे के एकांत में, दिन भर के किसी भी ऐसे क्षण में, जब वह राधिका के निकट जाने का प्रयास करता थाउपस्थित हो जाती थी! हाँ, इतनी राहत अवश्य थी कि होटल के कमरे से बाहर राधिका का व्यवहार एकदम शांत और सयंत हो जाता था, किसी भी सार्वजनिक स्थल पर कोई भी ऐसी अप्रिय घटना नहीं हुई जो उसे सबके सामने शर्मशार करने का पर्याय बनती। परन्तु वैवाहिक जीवन केवल सार्वजनिक स्थलों पर घूमना फिरना भर ही तो नहीं होता! अतः जब यह समस्या जारी रही तो वह घबरा उठा और बिना, घरवालों और मित्रों के प्रश्नों और टीका टिप्पणियों की परवाह किये, तुरन्त ही उसने अपनी सभी बुकिंग कैंसिल करवा वापिस लौटना ही उचित समझा।
राधिका से उसने कह दिया कि माँ की तबियत ठीक नहीं है अतः तुरन्त ही जाना होगा। जो कुछ दोनों के मध्य घट रहा था, राधिका भी उससे सर्वथा अनजान तो नहीं थी, पर उसे वास्तव में ही कुछ मालूम भी नहीं था कि उसके अवचेतन में क्या चल रहा है। सम्भावित अनिष्ट की कल्पना मात्र से ही भयभीत हो एक निरीह हिरणी की भाँति उसने इस समय चुपचाप किशन की बात मानना ही उचित समझा और वापिसी की तैयारी शुरू कर दी।

अभी तक किशन और राधिका का वैवाहिक जीवन तो उलझन भरा था !
क्या घर वापिस लौट कर उनके जीवन में कुछ परिवर्तन आया ?

जानने के लिए इंतज़ार कीजिये अगले अंक का......
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