Sunday, 3 January 2016

तू जहाँ जहाँ रहेगा.... भाग 7 समापन क़िस्त ~~ by a s pahwa



भाग 7
समापन अंक

तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 1
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 2
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 3
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 4
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 5
तू जहाँ जहाँ रहेगा....                                             भाग 6

हजरत साबिर पाक़ का नाम सभी धर्मो के मानने वालों के दिलों में अपना एक ख़ास मुकाम रखता है | अजमेर के ख्वाजा की दरगाह के बाद, यह दूसरा ऐसा स्थान है, यहाँ सबसे ज्यादा दर्शनार्थी आते हैं | साबिर पाक, बाबा फरीद के भांजे भी थे और शागिर्द भी | वैसे तो उनके जलाल के बारे में अनेको-अनेक किस्से-कहानियाँ सुनाने वाले मिल
जाते हैं, पर जो मैं आप से साँझा करना चाहता हूँ, वो उनका नाम साबिर पड़ने से सम्बंधित है | मैंने सुना है कि  बाबा फरीद की बहन हज़ जाने से पहले अपने बेटे को अपने भाई के पास छोड़ गयी | बाबा फरीद ने उस बच्चे को लंगर के इंतजामात में लगा दिया | बारह सालों के बाद, बहन जब हज से लौट कर आई तो देखा, उसका बेटा सूख कर काँटा हो चुका है ! बहन को बहुत दुःख हुआ कि अपने ही सगे भाई के घर में बच्चे की यह हालत हो गई ! दुखी मन से  उसने इस बारे में बाबा से शिकायत की | बाबा ने उस बच्चे को बुलाकर जब उसकी हालत देखी तो उससे पुछा, क्यूँ कुछ खाता क्यूँ नहीं था? “ हजूर, मैंने इसकी इजाजत न ली और न ही आपने खुद से दी!”, बच्चे ने कहा...  “पर तूने इन बारह सालों में खाना क्यूँ नही खाया? कभी तेरा जी नही किया?  उस बच्चे ने उत्तर दिया, “हजूर, आपने मुझे लंगर की सेवा-सम्भाल का काम दिया था, खाने के लिये नही कहा था |” सुनते ही बाबा हैरान रह गए ! जब तक साँस चल रही है तो शरीर को जिन्दा रखने के लिए कुछ तो चाहिए ही... अत: शँका निवारण के लिए पूछ ही लिया... तो फिर इस पेट की भूख का क्या?  बस, जब भूख, हाल-बेहाल कर देती, तो समीप के जंगल में जा कर कुछ कंद-मूल ही पेट की जठराग्नि को शांत करने का जरिया बन जाते | बाबा फरीद यह सुन अवाक रह गए, अल्लाह की बन्दगी में उन्हें पता ही नहीं चल पाया कि उनकी ही शागिर्दी में इतना कामिल और पहुँच वाला एक बच्चा है, जो पूरे बारह साल से केवल कंद-मूल खा कर अपनी गुजर कर रहा है ! बाबा ने उसे अपने अंग लगा कर कहा, तू तो बड़ा साबिर (सहन-शक्ति वाला) है और उसे तालीम देनी शुरू की तबसे उस का नाम साबिर ही हो गया | तालीम के बाद बाबा फरीद से विदा लेकर हजरत साबिर, हरिद्वार के समीप कलियर में आ गये और उनके नाम का जलवा दूर दूर तक फ़ैल गया, और उन्हें मानने वाले कलियर कहलाये जाने लगे | बाबा फरीद के एक और मुरीद हजरत निजामुद्दीन औलिया के नाम से मशहूर हुये जिनकी दरगाह दिल्ली में निजामुदीन में स्थित है और उनके मानने वाले आगे चलकर निजामी कहलाये |



साबिर पाक की दरगाह का जलवा, मैं नही जानता कि क्यूँ और कबसे, कुछ अदृश्य ताकतों और ऊपरी ह्वायों से पीड़ित बीमारों के लिये उम्मीद की आखिरी किरण बन गया | भूत-प्रेत, जिन्न और जिन्नात अपना अस्तित्व रखते हैं या नही, सदियों से विज्ञान नकारता आया है, मगर जन मानस आज भी इन पर विश्वास करता है, क्यूंकि कुछ प्रश्नों पर विज्ञान भी मौन ही रहता है | जो कुछ लौकिक है, विज्ञान की पहुँच केवल वहाँ तक ही सीमित है, परालोकिक घटनाएँ भी यूँ तो विज्ञान का ही एक अंग है, जिसे सुपर नैचुरल कह उसका अलग से वर्गीकरण कर दिया जाता है| पर यहाँ तो हम अपनी आँखों देखी घटनाओं के स्वयम ही साक्षी थे ! इस जगह, जहाँ तक आप की नजर जाती है, दूर-दूर तक ऐसे बीमार अपनी दिमागी कमजोरियों के चलते, रोते-बिलखते, या कुछ ऊट-पटाँग सी हरकतें करते नजर आते हैं | गरीबी, बिमारी और आधुनिक चिकित्सा प्रणाली से निराश लोगो का यहाँ डेरा लगा रहता है |
शाम का वो समाँ एक अजब सा मंजर बयाँ कर रहा था, दरगाह की जाली पकड़, लोग साबिर-साबिर करते चीख रहे थे, चिल्ला रहे थे और उनके विलाप और रूदन से माहौल में एक अजीब सी मुर्दनी सी छायी हुयी थी | समीप में ही नंगे फर्श पर ही बैठे, ऐसे मरीजों के परिवार वाले, बेबसी और लाचारी के भावों से अपनी कातर आँखों में केवल इतनी इल्तिजा लिये कि पीर साबिर का जलाल उनके दुःख दूर करेगा | इतना दुःख, इतनी तकलीफ और बेकसी के मारे लाचार चेहरे,, आप यहाँ कोई फोटो नही उतार सकते, कैमरा आपके पास होते हुये भी इतनी बेबस और बिलखती रूहों की बैचैनी और नम आँखों से अपने किसी अज़ीज़ को इस  हालत में देखते उनके परिजनों की व्यथित दशा, आपके हाथ जैसे जम जाते हैं, ... नही इस जगह और ऐसे हालातों की कोई फोटो नही ! बस, हज़रत साबिर पाक की मजार पर यही दुआ कर सकते थे कि इन सब की बैचैन रूहों को करार दे, तसल्ली देशान्ति दे साबिर पाक की दरगाह एक सूफी दरवेश की है, किसी दुनियावी बादशाह की नही, अत: आपको यहाँ कोई आलीशान भवन नही दिखेगा और ना ही बेहतरीन नक्काशी वाले झरोखे और महराब, कोई छतरी और मीनार भी नही, ये तो बस एक खुला हुआ ऐसा दर है, जिसमे रोजाना दीन-दुनिया और ऊपरी हवाओं से परेशान हजारों लोग, इस खानकाह में अपनी रूहानी शान्ति की तलाश में अपने आप या अपने परिवार वालों द्वारा लाये जाते हैं | इसलिये आपको यहाँ हर कदम पर सादगी और पाक़ीजगी का दीदार होता है |


बहरहाल, हम सब यहाँ उन सभी जगहों पर जब माथा टेक चुके तो हाज़ी साहब अपने साथ शायद दरगाह का ही एक खादिम लेकर आये, सम्भवता: उन्हें पहले ही सारी वस्तुस्थिति से अवगत करवा दिया गया था | अत: आते ही उन्होंने इशारे से हम सबको साबिर साहब की मजार की तरफ आने को कहा! फिर राधिका को इसके चारो तरफ लगी एक जाली को पकड़ कर बैठ जाने को कहा, अपने होठों में कुछ आयतों को बुदबुदाया, कोई दुआ की तथा फिर राधिका को छोड़कर हम सब को वहाँ से परे हट जाने को कहा ! हम सब दम साधे कुछ कदम परे हट का पत्थर के फर्श पर नीचे ही बैठ गए | राधिका अभी भी लोहे की जाली पकड़े चुपचाप बैठी थी ! देखते देखते दस से पन्द्रह मिनट गुजर गए ! परन्तु अभी तक सब कुछ शांत था ! कुछ क्षण इसी प्रकार और गुजरे ही होंगे कि बैठे बैठे ही अचानक से राधिका के शरीर में जोर-जोर से एक हलचल सी होने लगी ! उसने अपने दोनों हाथ जाली से हटा लिए, टाँगे लम्बी कर बुरी तरह से छटपटाने लगीं, हाथ कभी दायें तो कभी बाएं जोर जोर से हिलने लगे, मुंह से कुछ अस्पष्ट सी आवाजें निकलने लगीं जो शीघ्र ही चीखों में बदल गयी.... छोड़ों-छोड़ों.... जाने दो... मेरे पैर जल रहे हैं... मत जलायो मुझे.... जाने दो... अब जाने दो...
ऐसा मर्मस्पर्शी और हृदय-विदारक चीत्कार, जैसे किसी को हमारे सामने ही जिंदा जलाया जा रहा हो, और वो बुरी तरह से तड़प रहा हो! भय से हम सबके चेहरों का रंग सफेद हो चुका था, पर अपने सामने ही घट रही घटनाओं को सिवाय एक मूक दर्शक की ही भांति देखते रहने के अलावा हम कुछ और कर भी नहीं सकते थे ! हर बीतते पल के साथ राधिका का क्रंदन और भी तेज़ तथा हृदयस्पर्शी होता जा रहा था, वो सज्जन बहुत बारीकी से हर घटनाक्रम पर अपनी पैनी निगाह रखे हुए थे, फिर अचानक ही वह अपनी जगह से हटे और राधिका के सामने जाकर बैठ गए ! इन चंद मिनटों के वाकये में ही राधिका का चेहरा ऐसा हो गया था जैसे किसी ने उसके शरीर का पूरा खून ही निचोड़ लिया हो, बाल पूरे चेहरे पर फ़ैल चुके थे, आँखे इस कदर फ़ैली हुई थी कि जैसे अभी फट ही पढ़ेंगी ! उन ज़नाब ने अपना हाथ आगे बड़ा जोर से राधिका को बालों से पकड कर एक तरफ खींचा, और फिर धमकाते हुए बेहद ही हिंसक आवाज में कहा, “ आज के बाद लौट मत आना, अभी तो तेरे पैर ही जले हैं न... अगली बार पूरा ही जिन्दा जला दिया जायेगा !”
चली जाऊँगी, चली जाऊँगी... चली जाऊँगी... मैं तो चली गई थी... फिर मुझे ही ये पकड कर लायें हैं.... पूछ लो इनसे... रहम करो मुझ पे... मत जलाओ मुझे... अल्लाह की खातिर रहम करो...
उसी वेदना के साथ राधिका अपने हाथ पैर पटकते हुए चिल्लाती जा रही थी !
“हम कैसे मान लें तू फिर नही लौट आएगी ? कौल कर अभी... साबिर साहब की हाज़िरी में”
“ मैं तुम्हारी सारी बाते मानती हूँ, पहले मुझे जलाना बंद करो! रहम की भीख माँगती हूँ... रहम करो मुझ पे !”
उन साहब ने कोई ईशारा भर किया और राधिका सामान्य होने लगी, परन्तु अभी भी उसकी साँसे बहुत तीव्र गति से चल रही थी और आँखें असमान्य ढंग से लाल थीं !
धीरे-धीरे जैसे ही राधिका का तड़पना समाप्त हुआ तो फिर चीखों की जगह उसके रोने ने ले ली ! रोते-रोते ही उसने उन जनाब के पाँव पकड़ लिए और उनके पांवों पर गिर कितनी ही देर रोती रही, जैसे कि कोई अपने गुनाहों का पश्चाताप कर रहा हो ! फिर राधिका ने आंसुओं से भरा अपना चेहरा उठाया और उन ज़नाब के सामने हाथ जोड़ दिए.... हमेशा हमेशा के लिए चली जाऊँगी... बस मेरी एक बिनती मान लो... मुझे शुरू से सोने की नथ डालने का मन करता था... बस एक नथ दिलवा दो... मैं इस जगह से ही बहुत दूर चली जाऊँगी...
ज़नाब ने प्रश्नसूचक निगाहों से प्रदीप और किशन की तरफ देखा ! जैसे पूछना चाहते हों कि देना चाहते हो या नही? दोनों भाईओं ने तुरंत ही सहमति में अपना सिर हिलाया ! संकेत पा ज़नाब बोले,” दे देंगे... बता कहाँ देनी है?
राधिका के भीतर से आवाज़ आई, ”उसी कुएं में डाल देना, मै निकाल लूंगी और फिर हमेशा हमेशा के लिए चली जाऊँगी”
“ठीक है कल ही तुझे मिल जाएगी, अब साहब के दर पर माथा टेक और हमेशा के लिए दफा हो जा” जनाब की आवाज़ में अभी भी वही आक्रामकता थी और तेवर हिंसक
सुनते ही तुरंत राधिका ने साबिर साहब की मजार पर माथा टेका और तुरंत ही एक तरफ लुढ़क गई ! वो जनाब उठ खड़े हुए, हमारे साथ की औरतों से खा, बच्ची के कपड़े-लत्ते ठीक कर दो, पीछे की तरफ दीवार के सहारे टिका दो, हमेशा के लिए बला टल गई है... अभी कुछ देर में होश में आ जाएगी ! फिर बाहर ले जाकर कुछ दूध या जूस पिला देना और जब भी जाओ, जाने से पहले एक बार साहब की दरगाह पर माथा और टिकवा देना !

सभी ने जैसे राहत की साँस ली, वहीँ सबके सामने ही प्रदीप और किशन मारे ख़ुशी के एक दूसरे के गले लिपट गये! महीनों से साँसत में फंसे दोनों परिवारों के लिए यह एक नायाब खुशखबरी थी जिसे शब्दों में बयाँ करना नामुमकिन है !
और फिर जैसे ही राधिका ने अपनी आँखे खोल अपने आस-पास बैठे लोगों को यूँ ख़ुशी से सरोबार देखा, हैरान रह गई ! तुरंत ही हम सब उठे और दरगाह के बाहर उस तरफ चलने का उपक्रम करने लगे, जिधर कई प्रकार की दुकाने लगी हुई थीं और हमे वहाँ से दूध व जूस मिल सकता था !  ~~ इति                                             

          
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