Saturday, 16 January 2016

साहिब-ए-कमाल : गुरु गोबिंद सिंह



वाह परगटियो मरद अंगमड़ा वरियाम अकेला
वाहो वाहो गोबिंद सिंह आपे गुर चेला !!!
                                              ~  भाई गुरदास(दूजा)

अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार 1666 का बरस, सुबह का समाँ, पीर भीखण शाह, जाने किस प्रेरणा के तहत पश्चिम की जगह आज पूरब दिशा की तरफ मुँह कर, अपनी बन्दगी अता कर रहे थे कि उन्हें एक दिव्य(इलाही) रौशनी का आभास हुआ जो आसमाँ से उतर,  बिहार की तरफ पटना शहर में समा गई।



इसे परवरदिगार का कोई शुभ चिन्ह मान, तुरन्त ही पीर साहब अपने कुछ शागिर्दों के साथ पटना की तरफ चल दिए।

पटना में पहुँच कर उन्हें पता चला कि जिस घड़ी उन्हें उस रौशनी का आभास हुआ था, उसी क्षण गुरु तेग बहादुर के घर माता गुजरी की कोख से एक पुत्र ने जन्म लिया था। पीर साहब तुरन्त ही वहाँ पहुंचे, और क्या इस रौशनी का कोई मनोरथ है, इसे समझने के लिए मिट्टी के दो पात्रों में से एक में दूध और एक में पानी लेकर उस बालक के सामने पहुँच गए उस का दीदार करने !

बालक, जिसका नाम गोबिंद राय रखा गया था, पीर साहब के सामने लाया गया। पीर साहब को महसूस हुआ जैसे चौदहवीं का चाँद उनके सामने खिल उठा है, एक नूरानी तेज से भरपुर हँसता हुआ बच्चा, जैसे ही उनके सामने आया, जाने किस भावना के तहत उनका सर अपने आप ही उस बालक के सामने झुक गया। उन्होंने तुरन्त ही मिट्टी के दोनों कसोरे उसके आगे कर दिए। बालक ने सहज मुस्कराहट के साथ अपने दोनों हाथ उन दोनों कसोरों पर रख दिए।

दो कसोरे, प्रतीक थे तात्कालिक हिन्दुस्तान में प्रचलित दो प्रमुख्य धर्मों के - हिन्दू और मुस्लिम। और बालक गोबिंद राय के सामने रखने का पीर साहिब का उद्देश्य था कि उसका मन्तव्य जानना कि उनका झुकाव किसमे अधिक होगा ? दोनों पर हाथ रख, उस बच्चे ने संकेत दे दिया कि उसकी नज़र में दोनों धर्म समान हैं।

पीर साहब ने तुरन्त ही उस बालक के पाँव पकड़ सजदा किया, क्यूँकि उन्हें पता चल चुका था कि जुल्म और दहशत के जिस अँधेरे से निजात पाने के लिए सारी जनता जिस चमत्कार की आशा कर रही थी, वो चुका है।


इस पहली परीक्षा के चंद बरसों के भीतर ही जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा आन खड़ी हुई, जब कश्मीरी ब्राह्मणों का एक जत्था गुरु तेग बहादुर जी के सम्मुख याचक बन आ खड़ा हुआ, जिन्हें इस्लाम चुनने या फिर मौत का वरण करने का मौका दिया गया था। जज़िया कर तो शुरू से ही लागू था, परन्तु इस सल्तनत की इच्छा अब इस्लाम को दुनिया के कोने कोने में पहुंचाने की थी। गुरु साहिब ने इस मुश्किल समय में सोये हुए लोगों को झिंझोड़ने के लिए खुद अपनी कुर्बानी देने का रास्ता चुना और फिर खुद मुस्लिम इतिहासकारों की कलम से निकले शब्दों "हिन्द की चादर तेग बहादुर" ने अपना बलिदान दे आखिरकार सोये हुए लोगों को जगा दिया।


सन् 1675 में, केवल 9 बरस की उम्र में पिता की शहादत, पटना से शिवालिक की पहाड़ियों में बसे आनंदपुर साहिब आगमन, गुर गद्दी का सम्भालना और साथ ही एक नए नवेले उभरते हुए धर्म के अनुयाइयों का इस छोटी उम्र में सरंक्षक बनना ... किसी साधारण बालक के लिए सम्भव न था।

गुरु की शहादत से, सिख जाग तो गए थे, पर उनके इस गुस्से को संगठित रूप देना भी जरूरी था, जिससे दुःख और क्रोध से उपजी यह ऊर्जा व्यर्थ ही न चली जाए!

किस प्रकार से देश-समाज में घटित हो रही घटनाओं में एक सार्थक हस्तक्षेप किया जाये और सिख पन्थ को एक नई और राजनीतिक पहचान दी जाए..  इन प्रश्नो से उलझते और यौवन की तरफ कदम बढ़ाते नौजवान गोबिंद राय का कुछ समय अपने  हिमाचल के मित्र राजा की रियासत के पौंटा क्षेत्र में व्यतीत हुआ। यहाँ यमुना के किनारे और आस पास के सुरम्य वातावरण में इन्होंने अपना अधिकतर समय लेखन, युद्ध कलाओं और चिंतन में व्यतीत किया(पौंटा साहिब के इतिहास पर एक यात्रा वर्णन शीघ्र ही मेरी हिमाचल सीरीज के अंतर्गत आएगा!)

इस स्थान पर गोबिंद राय का काव्य प्रेम पूरी तरह से उभर कर आया, अपने अनेक काव्य ग्रन्थों के अलावा, यहीं लिखा गया, उनका एक महत्वपूर्ण काव्य खण्ड, बचित्र नाटक, जिसके एक खण्ड में उन्होंने अपने पूर्वजन्म के लेखे-जोखे को प्रस्तुत किया है। किस प्रकार  से वो दुर्गम हिमालय की कन्दराओं में अन्य ऋषि-मुनियों के संग हेमकुण्ड नाम की जगह पर तप कर रहे थे कि उन्हें आदेश हुआ कि अब उन्हें मातृ लोक प्रस्थान करना है, और वहाँ जाकर देश समाज को एक सही रास्ता दिखाना है।

पौंटा साहिब के चिंतन के पश्चात, उस मन्थन से जो उभर कर आया, वो घटनाक्रम, 1699 की बैसाखी सिख इतिहास का एक अतुलनीय पृष्ठ है, जब उसे एक नई पहचान और नाम मिला खालसा। और साथ ही मिला, एक अवसर,  शिष्य से आगे बढ़कर एक सैनिक बनने का। अभी तक सिख धर्म भक्ति मार्ग पर था, अब वो धार्मिक शक्ति से इतर अपनी एक राजनीतिक और सामाजिक पहचान की तलाश में जुट गया।

उसके बाद का इतिहास बहुत विस्तृत है, किस प्रकार सिख फौजें दमन और अत्याचार के खात्मे के लिए मुगल और पहाड़ी राजाओं से युद्ध करती रहीं। समय समय पर गुरु गोबिंद सिंह भी इसमें अपने परिवार तक की आहुति देते रहे, जिससे यह संकल्प कभी कमजोर न होने पाये। इसी कड़ी में उनके दो बड़े पुत्र चमकौर की लड़ाई में शहीद हुए तो दो छोटे पुत्र सरहिंद की दीवारों में जिन्दा ही चिनवा दिए गए। परन्तु उनके चेहरे पर कभी कोई शिकन नही आई, बल्कि अकाल पुरख का शुकराना अदा करते हुए सिखों की तरफ देख यही कहा -

इन सिक्खन के सीस पर  वार दिए सुत चार
चार मुए तो क्या हुआ, जब जीवत कई हज़ार!

और केवल यहीं नहीं रुके, जब औरंगज़ेब के मरने के पश्चात दिल्ली की मुगल सल्तनत भरभरा कर गिरने लगी, तो इस धरती पर अपना काम सम्पूर्ण जान , और गुरु ग्रन्थ साहिब को ही सदा सदा के लिए गुरु बना, वो एक बार फिर से उस लोक में चले गए, जिस तक पहुँचने के लिए वो सदियोँ से हेमकुण्ड में तपस्या कर रहे थे।

जिस कार्य के लिए उन्हें भेजा गया था, उसको पूर्ण करते ही, इस धरती पर सुख वैभव का भोग करना उनके लिए सम्भव नही था क्यूँकि यह तो उनका उद्देश्य ही नही था, वो इहलोक से परलोक गमन कर गए।

इस कड़ी में आगे बढ़ते हुए महाराजा रणजीत सिंह ने पहले सिख राज्य की स्थापना की और उसकी सीमाओं को कश्मीर से लेकर काबुल-कंधार तक पहुँचा दिया। पर यह एक अलग विषय है, इसका जिक्र फिर कभी !

यौद्धाओं में सबसे शूरवीर यौद्धा, सूफियों में सबसे बड़े सूफ़ी, जो माछीवाड़े के जंगल में अवसर मिलने पर, पवन को अपना सन्देशवाहक बना, अपने आराध्य को भी उलाहना देते हुए कह सकता है -


मित्तर प्यारे नूँ हाल मुरीदाँ दा कहणा
तुध बिन रोग रजाईयाँ दा ओढन।
नाग निवासाँ दे रहणा।।
सूल सुराही, खंजर प्याला,
बिंग कसाईयाँ दा सहणा।
यारड़े दा सानूँ सथर चंगा
भट्ठ खेड़ेयाँ दा रहणा।

Tell the condition of the believers to my Beloved friend.
[Tell Him that] Without You, using bed sheets is like a sickness and like living as being wrapped by the snakes.
The pitcher is a thorn and the glass is a dagger which are like tolerating being butchered.
Death bed with my Beloved is better than body burning [living with vice] without Him.


भले ही हमारे तथाकथित देसी विद्धवान जानबूझ कर अथवा अनजाने में ऐसे बेमिसाल गुरु की विद्वता और उसके योगदान पर लिखने में कृपणता कर गए, परन्तु अपने तमाम विरोधों के बावजूद अंग्रेज इतिहासकार उनके इस योगदान को रेखांकित करना नहीं भूले-

"If we consider the work which (Guru) Gobind (Singh) accomplished, both in reforming his religion and instituting a new code of law for his followers, his personal bravery under all circumstances; his persevering endurance amidst difficulties, which would have disheartened others and overwhelmed them in inextricable distress, and lastly his final victory over his powerful enemies by the very men who had previously forsaken him, we need not be surprised that the Sikhs venerate his memory. He was undoubtedly a great man and with great pride and honor I can say that  throughout the chronicles of human history, there was no other individual who could be of more inspiring personality thanGuru Gobind Singh."  (W. L. McGregor)

ऐसे महापुरुष, दार्शनिक, विद्वान, कवि हृदय, बेमिसाल यौद्धा, पीरान के पीर, राजान के राजन, अपने ही हाथों अपने पुत्रों को सजा कर मौत की बारात चढ़ाने वाले इस करिश्माई गुरु को आज हम सब अपनी नादानीवश भूल तो अवश्य गए है, परंतु समय कभी कुछ बातों को कभी नही भूलता। यदि उसे हमारी उस समय की दारुण चीख पुकार याद थी तो गुरु गोबिंद सिंह का बलिदान भी, उसे मुगलों का वो सुनहरी दौर भी याद है और उनकी आज की दयनीय हालत भी ! और वो आज भी हमारी इस  अहसानफरामोशता और उदासीनता से बेखबर नही ! परन्तु समय कभी आगे बढ़कर चेताता नही, वो निर्विकार भाव से एक दर्शक की भाँति सब देखता रहता है, अपना विचार नही देता, केवल एक ही बार हस्तक्षेप करता है, और फिर इतिहास के पन्ने एक नई इबारत लिख जाते हैं।

हम और आप ऐसी महान शख्शियत को न भूलें, इसके प्रयासस्वरूप मैंने एक छोटा सा यत्न किया है कि उनके प्रकाश पूर्व के इस अवसर पर आप सभी को इस दिन की शुभकामनाओं के साथ साथ उनके प्रति अपनी श्रद्धा के सुमन अर्पित कर सकें.......... धन्यवाद 💐💐
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