Monday, 18 January 2016

एक चिड़िया आई 1

बॉयोस्कोप के झरोखे से प्रयास है, छोटे बच्चों के लिए मजेदार कहानियों को लिखने का जो मैंने अपने बचपन में सुनी। इनमे से अधिकतर कहानियों को सुनाने का श्रेय मेरे स्वर्गवासी पिताजी को जाता है, जो अपने आप में ज्ञान का चलता फिरता विश्वकोश थे। हालाँकि सम्भव है कि इनमे से अनेक कहानियाँ आपने भी पहले सुनी हों या कहीं पढ़ी हों। इसका एकमात्र कारण यही है कि वो इन कहानियों के रचयिता नही थे, उन्होंने भी अपने जीवन काल में जो कहानी कहीं पढ़ी या सुनी, उसे फिर हम बच्चों को सुनाई ! उनकी स्मृति को नमन करते हुए पेश है उस संकलन के पिटारे में से इस श्रृंखला की पहली कहानी का पहला भाग -




1.  एक चिड़िया आई - 1

कनकपुर का राजा झटपट सिंह यूँ तो अपने अनेक ऊटपटाँग कामों और आदतों की वजह से पूरे राज्य भर की परेशानी का कारण बना ही रहता था। पर इधर इसमें एक नया शौक उभर आया था, कहानी सुनने का ! एक कहानी के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, फिर चौथी पांचवी....

कहानियाँ सुन सुन उसका मन ही नही भरता था। सुबह-दिन-शाम-रात, कोई भी समय हो वह कहानी सुनने को तैयार रहता था। उसने इतनी कहानियाँ सुन ली कि अब उसके नगर में कोई ऐसा कहानी सुनाने वाला नहीं बचा जो उसे कहानी सुना सके। और न ही कोई ऐसी कहानी बची थी जो उसने पहले से ही न सुन रखी हो !

राजा ने परेशान हो किसी तरह एक दो दिन काटे, पर बिना कहानी सुने न उसको खाना-पीना अच्छा लगे और न ही राज-काज में मन लगे। परेशान होकर मंत्री ने सलाह दी, और फिर पूरे नगर में मुनादी करवा दी गई कि जो भी राजा को ऐसी कहानी सुनाएगा जो कभी समाप्त न हो, और जिसे सुन कर राजा ही थक जाए और खुद से ही कह दे, बस अब और नहीं !

ऐसे कहानी सुनाने वाले विजेता कोे एक लाख सोने के सिक्के ईनाम में दिए जाएंगे और साथ ही राजा मनमौजी सिंह भी अपने नाक-कान काट कर उस कहानी सुनाने वाले को दे देगा, परन्तु यदि उसकी कहानी राजा केे रुकवाने से पहले ही समाप्त हो गई तो सजा के तौर पर उसके नाक-कान काट लिए जाएंगे।

चुनौती बहुत कड़ी थी, परन्तु ईनाम भी कोई कम नही था। सो, दूर दूर से किस्से-कहानियाँ सुनाने वाले आए।
जैसे ही राजा का मन होता, किसी कहानी सुनाने वाले को बुला लिया जाता। राजा अपनी आरामगाह में मसनद(गोल सिरहाना) लगा बैठ जाता, साथ ही आसपास में मंत्री और दरबारी भी ! फिर कहानी शुरू होती !

पर यह क्या ?

कोई कहानी दो घण्टे ही चल पाती तो कोई चार !
ज्यादा से ज्यादा कोई रात भर ही खिंच पाती !
कहानी सुनाने वाला थक कर परेशान हो जाता पर राजा की कहानी सुनने की अभिलाषा समाप्त ही नही होती।
जैसे ही कोई कहानी खत्म हो जाती, राजा का पारा गर्म हो जाता। वो गुस्से में आदेश देता, " नाक कान काट लो इसके !, हूँ, कहानी सुनाएगा ये, जो कभी समाप्त न होंगी !"

फिर राजा के गुस्से को शाँत करने के लिए अगले कहानीकार और किस्सागो को बुलाया जाता। उनकी कहानी समाप्त हो जाने पर उनके भी नाक-कान काट उन्हें भी उनके घर वापिस भेज दिया जाता।

महीनो बीत गए, बीसियों कहानी कहने वाले आए, पर कोई भी राजा की शर्त पूरी नहीं कर पाया। बस, अपने नाक-कान कटवा घर वापिस चला गया।

फिर एक समय ऐसा भी आया कि अपने नाक-कान कटवाने के डर से कोई भी कहानी कहने वाला, राजा को कहानी सुनाने की हिम्मत नही कर सका। पर राजा के लिए यह स्थिति भी बहुत परेशान करने वाली थी। उसको तो हर समय एक नई कहानी सुननी ही होती थी, नहीं तो वह चिड़चिड़ा हो जाता था, जिससे सभी मंत्रियो की शामत आ जाती थी।

आखिर, मंत्रियों न अपनी शामत से बचने के लिए राजा को सलाह दी कि अब अपने राज्य के अलावा आसपास के राज्यों में भी मुनादी करवाई जाये और ईनाम की रकम भी बढ़ा दी जाये, जिससे दूसरे राज्यों से भी किस्सेे सुनाने वालों को इसके बारे में पता चल सके।

ऐसा ही किया गया और ईनाम की राशि भी बढ़ा कर दो लाख सोने के सिक्के कर दी गई।

इतने बड़े ईनाम के लालच में दूर दूर से लोग कहानियाँ सुनाने के लिए आये। परन्तु परिणाम वही निकलता था,भले ही कितनी नई और लम्बी कहानी हो आखिरकार कुछ समय बाद तो उसे समाप्त होना ही होता था। और फिर, शर्त के मुताबिक अपने नाक-कान कटवा वो बिचारे अपने नगर को लौट जाते थे।

जब यही सिलसिला महीनो चलता रहा, तो एक बार फिर से सभी कहानी सुनाने वाले समाप्त हो गए। राजा की त्योरियाँ चढ़ गई, मंत्रियों की अब फिर से खैर नहीं !

जगह जगह गुप्तचर दौड़ाये गए कि जाओ किसी को तो पकड़ कर लाओ।

और फिर एक दिन आया, गाँव का एक साधारण युवक ! जो दिखने में भी बिल्कुल आम सा था और उसकी वेशभूषा भी बिल्कुल देहाती थी, मगर आत्मविश्वास से लबालब था। उसने ताल ठोक कर कहा कि वो सुनाएगा राजा को एक ऐसी कहानी, जिसे सुनकर राजा को ही उसे रोकना पड़ेगा !

 मंत्रियों और दरबारियों को उसकी कच्ची उम्र देखकर तरस भी आया कि यदि बीस-बाइस बरस की उम्र में इस नौजवान के नाक-कान कट गए तो बिचारा पूरा जीवन कैसे गुजारेगा ! उसे लाख समझाया, पर उसके हौसले पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वह अपनी जगह अडिग ही टिका रहा।

जो होनी को मंज़ूर होगा, अंत वही होगा, इस भावना के तहत, उस नौजवान को कहानी सुनाने की शर्त बता, राजा के सामने बैठा दिया गया।

और फिर उस नौजवान ने अपनी कहानी कहनी शुरू की....

सनकपुर का राजा मनमौज सिंह भी अपने नाम के अनुरूप ही अपनी सनक के लिए पूरे राज में मशहूर था। सारी प्रजा उसके ऊलजलूल निर्णयों से सदा परेशान रहती थी। पर इससे उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। बल्कि दिन प्रतिदिन राजा की ऐसी हरकतें बढ़ती ही जाती थी। मंत्रियों सहित सभी दरबारी भी बिचारे राजा की ऐसी हरकतों से बेहद दुखी थे, परन्तु राजा का जो विरोध करे उसकी सजा बहुत गम्भीर थी, अत: अपनी जान बचाने की खातिर उन्हें भी राजा के हर सही गलत फैसले का समर्थन करना ही पड़ता था।

ऐसे ही एक बार राजा ने अपने बाग़ में घूमते हुए सुंदर फूल देखे, राजा उन्हें देख बहुत खुश हुआ और माली को ईनाम में अपना सोने का हार उतार कर दे दिया। फिर, दो-तीन दिन के बाद राजा का उसी बाग़ में दुबारा से जाना हुआ, परन्तु इस बार सुंदर फूल नही थे। राजा बहुत क्रोधित हुआ और गुस्से में आदेश दिया तुरन्त इस बाग़ के माली को पकड़ कर लाया जाए।

कुछ ही देर में राजा के सिपाही, उसी माली को पकड़ लाये जिसे राजा ने कुछ दिन पहले ही अपना हार इनाम में दिया था। माली को अपने सामने देखते ही राजा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया और वह उससे कड़क कर बोला, " ओ कामचोर माली, दो दिन पहले इस बाग़ में इतने सुंदर फूल थे, आज सारे कहाँ चले गए? क्या तू उन्हें बेच कर खा गया ?"

घबराया हुआ माली हाथ जोड़ कर बोला, " राजा जी, इसमें मेरा कोई दोष नहीं, फूल तो बस कुछ दिन के लिए ही खिलता है, फिर अपने आप ही मुरझा कर गिर जाता है । "

" नही, तुम झूठ बोल रहे हो।" राजा अभी भी गुस्से से तमतमा रहा था। फिर उसी गुस्से में उसने आदेश दिया, " इस कामचोर माली को सौ कोड़े लगाये जाएँ, और इसके घर की तलाशी ले कर जो भी सामान मिले उसे सरकारी खज़ाने में जमा करवा दिया जाए।"

मंत्री सहित सभी जानते थे कि यह उस गरीब माली के प्रति अन्याय है, पर राजा के निर्णय का विरोध कर कौन उसके गुस्से का सामना करता ? इसलिए सभी चुपचाप उस अन्याय को भी देखते रहे। माली को सौ कोड़े भी मारे गए और उसकी झोपडी की भी तलाशी ले उसमे जो कुछ भी मिला उसे सरकारी खज़ाने में जमा करवा दिया गया, जिसमे वो हार भी शामिल था, जिसे स्वयं राजा ने ही कुछ ही दिन पहले उस माली को ईनाम में दिया था।

गुस्से से भरा राजा अपने महल में पहुँचा और सभी मंत्रियों को तुरन्त ही दरबार में पहुँचने का हुक्म दिया। सभी के पहुंचते ही, राजा ने हुक्म जारी किया कि आज से इस नगर और राज्य में सभी नागरिक केवल और केवल फूल ही उगाएंगे। जितनी भी जगह है, जो भी खेत हैं, सड़कों के किनारों पर भी सिर्फ फूल ही लगेंगे, यदि कोई किसान ने  कुछ और लगाया तो उसे 200 कोड़े लगाकर राज्य से बाहर निकाल दिया जाएगा । साथ ही उसकी सारी जमीन भी छीन ली जायेगी।

तुरन्त ही राजा की यह आज्ञा पूरे राज्य में मुनादी के जरिये फैला दी गई। सभी किसान और पूरी प्रजा भी राजा के इस निर्णय को सुन सन्न रह गई, परन्तु राजा के विरोध में बोलने की किसी में हिम्मत भी नही थी। अत: ऐसा ही हुआ, जैसा राजा चाहता था। कुछ ही महीनों में पूरे राज्य भर में फूल ही फूल ! जिधर तक नज़र उठा कर देखो, फूल खिले हुए!

खेतों में, सड़कों के किनारे, बगीचों में, लोगों के घर आँगन में नाना प्रकार के रंग बिरंगे, खुशबूदार फूल !
ऐसे लगता था जैसे कि पूरा राज, धरती का कोई टुकड़ा न होकर एक विशाल गुलदस्ता हो।

राजा सुबह सवेरे अपने मंत्रियों के साथ सैर करने को जाता, तो इतने फूल देखकर बहुत खुश होता। अपने मंत्रियों को भी बताता, देखा मेरे आदेश का नतीजा, हर जगह इतने फूल हैं कि अब कोई बेईमान माली भी फूलों की चोरी नहीं कर पायेगा। चापलूस दरबारी और मंत्री भी अपनी जान बचाने की खातिर राजा की हाँ में हाँ मिलाते रहते !

कुछ दिन जब और गुजर गए तो अब राजा खुद ही इतने फूलों से परेशान रहने लगा। पर कुछ कहता कैसे? कहने में तो उसकी ही हेठी थी न !

एक दिन राजा अपने मंत्री के साथ अपने नगर में भम्रण को गया। वह यह देख कर हैरान हो गया कि उसके नागरिक इतने कमज़ोर हो गए थे। जगह जगह बीमार और लाचार जानवर सड़क किनारे ही पड़े हुए थे ककी उनकी देखभाल करने वाला नहीं था। कइयों की हड्डियाँ तक बाहर निकल आई थी, वो बिचारे ठीक से चल भी नही पा रहे थे ! राजा को यह सब देखकर बहुत निराशा हुई कि उसके राज्य में यह सब इतने दुखी हैं। राजा ने मंत्री से इसका कारण पूछा तो मंत्री ने बहुत अदब से जवाब दिया, " महाराज, केवल फूलों को उगाने के आदेश के कारण आज यह सब इस स्थिति में पहुँचे  हैं।"

"कैसे ?" राजा ने गुस्से से पूछा

मंत्री ने उत्तर दिया, " महाराज, पूरे के पूरे खेत में फूल उगाने के बाद इनके पास कोई जमीन ही नही बची, जिस पर यह अपने खाने के लिए अनाज उगा सकते। जब अनाज ही नही खाएँगे तो इनमे शक्ति ही कहाँ से आएगी !"

यह सुनकर राजा गहरी सोच में डूब गया, यह तो बहुत बड़ी चिंता की बात थी उसके लिए ! अगर राज्य के आमजन की यह हालत है तो उसके अपने सैनिकों की हालत भी ऐसी ही हो गई होगी। देर-सवेर किसी भी दुश्मन देश को हमारे कमज़ोर सैनिकों के बारे में पता चला तो वह तो तुरन्त ही हम पर हमला बोल देगा। हमारे सैनिक उनसे लड़ेंगे कैसे? इनमे तो तलवार तक उठाने की हिम्मत नहीं बची।

"हम्म..." राज दरबार वापिस चलो, राजा ने हुक्म दिया, " हम इस समस्या का हल निकालना चाहते हैं। "

राजा के इतना कहते ही सभी दरबारी और सेवक राजा के साथ राजमहल की तरफ मुड़ चले !

राजा झटपट सिंह पूरे मनोयोग के साथ इस कहानी को सुन रहा था, युवक दिखने में भले भी कैसा था पर उसकी कहानी और सुनाने की कला, दोनों ही राजा को पसन्द आ गई थी। ऐसी कहानी उसने पहले कभी नहीं सुनी थी, अतः उसकी पूरी रुचि इसमें बन चुकी थी !

अब राजा मनमौजी सिंह का अगला कदम क्या होगा?
यह उत्कंठा यदि राजा झटपट सिंह के साथ आप सभी को भी है तो पढ़ना न भूलियेगा, उस युवक के दावे के अनुसार इस कभी न समाप्त होने वाली कहानी का अगला अंक और जानिये कि उस युवक को अपनी नाक और कान कटवाने पढ़े या फिर राजा मनमौजी सिंह को... क्रमशः


 एक चिड़िया आई - 2
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